Sunday, October 18, 2009

નવુ વરસ,રહે સરસ








બધાજ ગુજરાતી ભાઈ, બહેનો, મિત્રો ને નૂતન વર્ષાભિનંદન

Thursday, October 15, 2009

धन तेरस, दीपावली और नव वर्ष की शुभ कामनाए




कुम-कुम भरे कदमो से आये लक्ष्मीजी आप के द्वार ...
सुख-सम्पति मिले आपको अपार ...
धन तेरस की सुभ कामनाये करे स्वीकार 
और शुभ दीपावली , नव वर्ष की शुभ कामनाएं
Wish you all a Happy, Prosperous and Peaceful Dhanteras, Deepavali ...and Saalmubarak!


Sunday, October 04, 2009

चिटठी आयी है ...पंकज उधास


Pankaj Udhas
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चिटठी आयी है ...


चिटठी आयी है आयी है चिटठी आयी है,

चिटठी आयी है वतन से चिटठी आयी है,

बडे दिनों के बाद, हम बेवतनों को याद.. वतन कि मिटटी आयी है,

चिटठी आयी है ...……
उपर मेरा नाम लिखा है,

अंदर ये पैगाम लिखा है,

ओ परदेस को जाने वाले,

लौट के फिर ना आने वाले,

सात समुंदर पार गया तू,

हमको जिंदा मार गया तू

खून के रिश्ते तोड गया तू,

आंख मैं आंसू छोड गया तू,

कम खाते हैं कम सोते हैं,

बहुत ज्यादा हम रोते हैं!

चिटठी आयी है ...……
सूनी हो गयी शहर कि गलियाँ,

काटें बन गयीं बाग कि कलियाँ,

कह्ते हैं सावन के झूले,

भूल गय तू हम नही भूले,

तेरे बिन जब आयी दिवाली,

दीप नहिं दिल जले हैं खाली,

तेरे बिन जब आयी होली,

पिचकारी से छूटी गोली……

पीपल सूना पनघट सूना घर शम्शान का बना नमूना,

फसल कटी आयी बैसाखी तेरा आना रह गया बाकि!

चिटठी आयी है ...…
पहले जब तू खत लिखता था,

कागज में चेहरा दिखता था,

बंद हुआ ये मेल भी अब तो,

खतम हुआ ये खेल भी अब तो…

डोली मे जब बैठी बहना,

रस्ता देख रहे थे नैना,

मैं तो बाप हुँ मेरा क्या है,

तेरी मां का हाल बुरा है,

तेरी बीवी करती है सेवा,

सूरत से लगती है बेवा…

तूने पैसा बहुत कमाया,

इस पैसे ने देश छुडाया,

पछी पिंजरा तोड के आ जा…

आजा उमर बहुत है छोटी,

अपने घर में भी है रोटी,चिटठी आयी है

चिटठी आयी है आयी है चिटठी आयी है

चिटठी आयी है वतन से चिटठी आयी है

चिटठी आयी है ……
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 चाँदी जैसा रंग है तेरा ...

चाँदी जैसा रंग है तेरा, सोने जैसे बाल

एक तु ही धनवान है गोरी, बाकि सब कंगाल

चाँदी जैस रंग है तेरा, सोने जैसे बाल

एक तु ही धनवान है गोरी, बाकि सब कंगाल

एक तु ही धनवान है गोरी, बाकि सब कंगाल
जिस रस्ते से तु गुजरे,वो फूलों से भर जाये…


जिस रस्ते से तु गुजरे,वो फूलों से भर जाये,

तेरे पैर कि कोमल आहट सोते भाग जगाये,

जो पत्थर छू ले गोरि तु वो हीरा बन जाये,

तू जिसको मिल जाये वोह,

तू जिसको मिल जायेवो हो जाये मालामाल्…

एक तु ही धनवान है गोरी, बाकि सब कंगाल

चाँदी जैसा रंग है तेरा, सोने जैसे बाल

एक तु ही धनवान है गोरी, बाकि सब कंगाल
जो बे-रंग हो उस पर क्या क्या रंग जमाते लोग…


जो बे-रंग हो उस पर क्या क्या रंग जमाते लोग,

तू नादां न जाने कैसे रूप चुराते लोग,

नजरें भर भर देखें तुझको आते जाते लोग…

छैल छबीली रानी थोडा……

छैल छबीली रानी थोडाघूंघट और निकाल्,

एक तु ही धनवान है गोरी, बाकि सब कंगाल

चाँदी जैसा रंग है तेरा, सोने जैसे बाल,

एक तु ही धनवान है गोरी, बाकि सब कंगाल…
धनक घट कलियां और तारे सब हैं तेरे रूप…


धनक घट कलियां और तारे सब हैं तेरे रूप,

गजलें हों या गीत हों मेरे सब में तेरा रूप..

युं ही चमकती रहे हमेशा तेरे हुस्न कि धूप

तुझे नजर न लगे किसी कि,

तुझे नजर न लगे किसी किजिये हजारों साल
एक तु ही धनवान है गोरी, बाकि सब कंगाल 
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ज़रा आहिस्ता चल


दर्द की बारिश मद्धम सही ज़रा आहिस्ता चल
दिल की मिट्टी है अभी तक नम ज़रा आहिस्ता चल

तेरे मिलने और फिर तेरे बिछड़ जाने के बीच
फासला रुसवाई का है कम ज़रा आहिस्ता चल

अपने दिल में नहीं है उसकी महरूमी की आग
उस की आंखों में भी है शबनम ज़रा आहिस्ता चल

कोई भी हो हमसफर राशिद न हो खुश इस कदर
अब के लोगों में वफ़ा है कम ज़रा आहिस्ता चल
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चुपके चुपके सखियों से वो बातें करना भूल गई



चुपके चुपके सखियों से वो बातें करना भूल गई
मुझको देखा पनघट पे तो पानी भरना भूल गई

पहले शायद उसको मेरे चेहरे का अंदाज़ ना था
मुझसे आँखें टकराईं तो खुद पे मरना भूल गई

सच पूछो तो मेरी वजह से उसको ऐसा रोग लगा
काजल मेहंदी कंगन बिंदिया से संवरना भूल गई


क्या जाने कब उससे मिलने आ जाऊं इस ख्वाहिश में
छत पर बैठी रहती है वो छत से उतरना भूल गई

Friday, October 02, 2009

अपने ही मन से कुछ बोलें - अटल बिहारी वाजपेयी


Atal Bihari Vajpayee (Born December 25th 1924 - Prime minister of India 1996-2004) is respected by one and all is also a poet  reflecting his sensitivity. The following poem (अपने ही मन से कुछ बोलें )is a reminder that we retain sensitivity in our inner being when death knocks at your door.


क्या खोया क्या पाया जग में 
मिलते और बिचदतेय मग में 
मुझे किसी से नही शिकायात
यधपि छला गया पग पग में 
इक दृष्टी बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें 
अपने ही मन से कुछ बोलें 


पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
जीवन इक अनंत कहानी 
पर तन की अपनी सीमाएँ 
यधपि सौ सर्दों की वाणी 
इतना काफी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाजा खोले 
अपने ही मन से कुछ बोलें 


जनम मरण का अविरित फेरा 
जीवन बंजारों का डेरा 
आज यहाँ कल वहाँ कुछ है 
कौन जानता कहाँ सवेरा 
अंधियारा आकाश आसीमित, प्राणों के पंख को तोलें 
अपने ही मन से कुछ बोलें




Thursday, October 01, 2009

अग्नि पथ!,, मधुशाला! - हरिवंशराय बच्‍चन



अग्नि पथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
वृक्ष हों भले खड़े,
हो घने, हो बड़े,
एक पत्र-छॉंह भी मॉंग मत, मॉंग मत, मॉंग मत!

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
तू न थकेगा कभी!
तू न थमेगा कभी!
तू न मुड़ेगा कभी!-कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!

यह महान दृश्‍य है-
चल रहा मनुष्‍य है
अश्रु-श्‍वेद-रक्‍त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! 

मधुशाला 
मदिरालय जाने को घर से
चलता है पीनेवाला,
'
किस पथ से जाऊँ?'
असमंजस में है वह भोलाभाला;
अलग-अलग पथ बतलाते सब
पर मैं यह बतलाता हूँ-
'
राह पकड़ तू एक चला चल,
पा जाएगा मधुशाला'।

पौधे आज बने हैं साकी
ले-ले फूलों का प्याला,
भरी हुई है जिनके अंदर
परिमल-मधु-सुरभित हाला,
माँग-माँगकर भ्रमरों के दल
रस की मदिरा पीते हैं,
झूम-झपक मद-झंपित होते,
उपवन क्या है मधुशाला!

एक तरह से सबका स्वागत
करती है साकीबाला,
अज्ञ-विज्ञ में है क्या अंतर
हो जाने पर मतवाला,
रंक-राव में भेद हुआ है
कभी नहीं मदिरालय में,
साम्यवाद की प्रथम प्रचारक
है यह मेरी मधुशाला।

छोटे-से जीवन में कितना
प्यार करूँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में
कहलाया 'जानेवाला',
स्वागत के ही साथ विदा की
होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही
मेरी जीवन-मधुशाला!  

हम होंगे कामयाब एक दिन...... गिरिजा कुमार माथुर


"We Shall Overcome" is an early 1900' American Song that was translated by Girija Kumar Mathur now popularly sung in all Indian schools by children

 हम होंगे कामयाब,
हम होंगे कामयाब एक दिन
हो हो हो मन मे है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन


हम चलेंगे साथ-साथ
डाल हाथों में हाथ
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन


होंगी शांति चारो ओर
होंगी शांति चारो ओर एक दिन
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
होंगी शांति चारो ओर एक दिन 


नहीं डर किसी का आज
नहीं डर किसी का आज एक दिन
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
नहीं डर किसी का आज एक दिन


हो हो हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन


हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले...-मिर्जा ग़ालिब


हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले



डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले 



निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले



भ्रम खुल जाये जालीम तेरे कामत कि दराजी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले 



मगर लिखवाये कोई उसको खत तो हमसे लिखवाये
हुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले 



हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो जमाना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले



हुई जिनसे तव्वको खस्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज्यादा खस्ता-ए-तेग-ए-सितम निकले



मुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले



जरा कर जोर सिने पर कि तीर-ऐ-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले 



खुदा के बासते पर्दा ना काबे से उठा जालिम
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफिर सनम निकले



कहाँ मयखाने का दरवाजा 'गालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था के हम निकले 

-मिर्जा ग़ालिब  

Translation of Urdu words in English
चश्म-ऐ-तर - wet eyes
खुल्द - Paradise
कूचे - street
कामत - stature
दराजी - length
तुर्रा - ornamental tassel worn in the turban
पेच-ओ-खम - curls in the hair
मनसूब - association
बादा-आशामी - having to do with drinks
तव्वको - expectation
खस्तगी - injury
खस्ता - broken/sick/injured
तेग - sword
सितम - cruelty
क़ाबे - House Of Allah In मक्का 
वाइज़ - preacher 


नर हो न निराश करो मन को...मैथिलि शरण गुप्त की मेरी प्रिय कविता




नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को ।


संभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को ।


जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को ।


निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को ।


और हम सोचते है हम बापू को समज रहे है ?


आज कल गाँधी जी पर कुछ भी कमेन्ट करना बड़ा सहज हो चूका है! बस थोडी...उनकी आत्मा कथा क्या पढ़ ली बहुत से लोग उनकी जीवनी पर कमेंट्स कर लेते है !



कैसे रहे होंगे महात्मा ? उनकी आत्मा-कथा जब आप पड़ेंगे तोह आप ऐसा भी महसूस करे की वोह सत्य की खोज पर ज्यादा केन्द्रित है ! इसी लिए उन्होने आपनी बायोग्राफी का नाम अंग्रेजी में "माय एक्स्पेरित्मेंट विथ ट्रुथ" का शीर्षक दिया!


जो इंसान एक्सपेरिमेंट (संशोधन) करता हो ( सच के साथ !) वोह कभी ऐसा नही कहेता की येही सच है ...उनका संशोधन बस चलता ही रहा...और उनके करीबी मित्र , नेता काफी परेशांन रहे होंगे की यह व्यक्ति राज नीति में कभी भी जल्दी निर्णय नही ले सकते! शायद पंडित जी , सरदार पटेल जैसे नेता ऐसा ही सोचते होंगे! ऐसा भी हो सकता है की गाँधी जी ने कभी राजनीती का रास्ता या पदवी नही ली! नही लीना चाहते थे ! हो सकता है काफी पहले ही उन्होने जान लिया हो की वोह कुर्सी पर, यानी की राज गद्दी पर नही बैठना चाहते है!


पर हमारे देश के नेता और पडोसी देश के नेता ने उन्हे बहुत गहरे पॉलिटिक्स में उतार रखा है ! अगर आप को कुछ किताब का सेल ज्यादा करना है तोह कमेन्ट कर लो गाँधी पर! खोद दो १९४०-१९४७ की हिस्ट्री और दाल दो गाँधी का नाम! पर किसी ने नही सोचा की गाँधीजी राजनेता नही थे! काफी सरल व्यक्तित्व रहा होगा उनका ! उनको समजना हो... तोह थोडा सरल होना पड़ता है और उनके जैसा थोडा तोः बनना पड़ता ही है पर ... ऐसा होना कठीण है ! सच का रास्ता आसान नही है! और चूकी ऐसा लोग नही कर पाते, वोह गाँधी को समजे बिना ही गलत राह देते है !


नीचे है कुछ गाँधी जी के विचार इस गाँधी जयंती के अवसर पर ...


सत्य की खोज!


सत्य.... क्या है? यह एक कठिन प्रश्न है, लेकिन अपने लिए मैंने इसे यह कहकर सुलझा लिया है कि जो तुम्हारे अंतःकरण की आवाज कहे, वह सत्य है। आप पूछते हैं कि यदि ऐसा है तो भिन्न-भिन्न लोगों के सत्य परस्पर भिन्न और विरोधी क्यों होते हैं? चूंकि मानव मन असंख्य माध्यमों के जरिए काम करता है और सभी लोगों के मन का विकास एक-सा नहीं होता इसलिए जो एक व्यक्ति के लिए सत्य होगा, वह दूसरे के लिए असत्य हो सकता है। अतः जिन्होंने ये प्रयोग किए हैं, वे इस परिणाम पर पहुंचे हैं कि इन प्रयोगों को करते समय कुछ शर्तों का पालन करना जरूरी है।


ऐसा इसलिए है कि आजकल हर आदमी किसी तरह की कोई साधना किए बगैर अंतःकरण के अधिकार का दावा कर रहा है, और हैरान दुनिया को जाने कितना असत्य थमाया जा रहा है। मैं सच्ची विनम्रता के साथ तुमसे कहना चाहता हूं कि जिस व्यक्ति में विनम्रता कूट-कूट न भरी हो, उसे सत्य नहीं मिल सकता। यदि तुम्हें सत्य के सागर में तैरना है, तो तुम्हें अपनी हस्ती को पूरी तरह मिटा देना होगा ।




एक बात और मेरे मन में पक्की होती जा रही है कि जो कुछ मेरे लिए संभव है, वह एक बच्चे के लिए भी संभव है। यह बात मैं ठोस कारणों के आधार पर कह रहा हूं। सत्य की खोज के साधन जितने कठिन हैं, उतने ही आसान भी हैं। अहंकारी व्यक्ति को वे काफी कठिन लग सकते हैं और अबोध शिशु को पर्याप्त सरल।




सत्य के खोजी को धूलि के कण से भी अधिक विनम्र होना चाहिए। धूलि के कणों को तो दुनिया अपने पैरों तले रौंदती है, लेकिन सत्य का खोजी इतना विनम्र होना चाहिए कि उसे धूलिकण भी रौंद सकें। तभी, और केवल तभी, उसे सत्य के दर्शन सम्भव होंगे।




सतत अनुभव ने मेरा यह विश्वास दृढ़ कर दिया है कि ईश्वर सत्य के अलावा और कुछ नहीं हैं.... सत्य की जो क्षणिक झलकियां..... मैं पा सका हूं, उनसे सत्य के अवर्णनीय तेज का वर्णन करना संभव नहीं है, सत्य का तेज नित्य दिखाई देने वाले सूर्य के प्रकाश से लाखों गुना प्रखर है।




सत्य प्रत्येक मनुष्य के हृदय में वास करता है, और मनुष्य को उसे वहीं खोजना चाहिए; सत्य जिसे जैसा दिखाई दे, वह उसी से निर्देशित हो। लेकिन किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह सत्य का जिस रूप में दर्शन करता है, उसके अनुसार चलने के लिए दूसरे लोगों पर जोर-जबर्दस्ती करे।




मैं कितना ही तुच्छ होऊं, पर जब मेरे माध्यम से सत्य बोलता है तब मैं अजेय बन जाता हूं। मैं एक ही ईश्वर का दास हूं और वह है सत्य।




मैंने ईश्वर के न तो दर्शन किए हैं और न ही उन्हें जाना है। मैंने ईश्वर के प्रति दुनिया की आस्था को अपनी आस्था बना लिया है, और चूंकि मेरी आस्था अमिट है, मैं उस आस्था को ही अनुभव मानता हूं। लेकिन यह कहा जा सकता है कि आस्था को अनुभव मानना तो सत्य के साथ छेड़छाड़ करना है; सचाई शायद यह है कि ईश्वर के प्रति अपनी आस्था का वर्णन करने के लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं।


ईश्वर सत्य है, पर वह और भी बहुत कुछ है। इसीलिए मैं कहता हूं कि सत्य ईश्वर है... केवल यह स्मरण रखें कि सत्य ईश्वर के अनेक गुणों में से एक गुण नहीं है। सत्य तो ईश्वर का जीवंत स्वरूप है, यही जीवन है, मैं सत्य को ही परिपूर्ण जीवन मानता हूं। इस प्रकार यह एक मूर्त वस्तु है, क्योंकि संपूर्ण सृष्टि, संपूर्ण सत्ता ही ईश्वर है और जो कुछ विद्यमान है- अर्थात सत्य- उसकी सेवा ईश्वर की सेवा है।


कला की आंतरिकता


मैं उस कला और साहित्य का पक्षधर हूं जो जनता से जुड़ा हो। वही कला कला है जो सुखकर हो।


वस्तुओं के दो पक्ष होते है। ...बाह्य और आंतरिक... बाह्य का मूल्य केवल यह है कि वह आंतरिक की सहायता करे। इस प्रकार प्रत्येक सच्ची कला आत्मा की अभिव्यक्ति होती है। बाहय रूपों का मूल्य यही है कि वे मनुष्य की आंतरिक भावना की अभिव्यक्ति हैं।




मैं जानता हूं कि बहुत-से व्यक्ति अपने को कलाकार कहते हैं, और उन्हें इस रूप में मान्यता भी प्राप्त है, लेकिन उनकी कृतियों में आत्मा के उदग्र आवेग और आकुलता का लेश भी नहीं होता। वही


प्रत्येक सच्ची कला आत्मा के आंतरिक स्वरूप की सिद्धि में सहायक होनी चाहिए। जहां तक मेरा ताल्लुक है, मुझे अपनी आत्मसिद्धि में बाहय रूपों की सहायता की कतई जरूरत नहीं है। इसलिए मैं कोई कलाकृतियां प्रस्तुत नहीं कर सकता।


हो सकता है कि मेरे कमरे की दीवारें नंगी हों; मुझे तो शायद सिर पर छत की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि तब मैं असीम विस्तार वाले तारों भरे आकाश को निहार सकता हूं। जब मैं चमकते तारों से भरे आकाश हो निहारता हूं तो मेरे सामने ऐसा अद्भुत परिदृश्य होता है जिसकी बराबरी मनुष्य की स्वकृत कला कभी नहीं कर सकती।


इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं सामान्यतः मानी गई कला-वस्तुओं के मूल्य को स्वीकार करने से इंकार करता हूं बल्कि सिर्फ यह है कि मैं व्यक्तिगत रूप से यह अनुभव करता हूं कि ये प्राकृतिक सौंदर्य के शाश्वत प्रतीकों की तुलना में कितनी अपूर्ण है। मानवकृत इन कला-वस्तुओं का मूल्य वहीं तक है जहां तक कि वे आत्मा को सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने में सहायक होती है!


अपने बारे में (गांधीजी)


मैं सोचता हूं कि वर्तमान जीवन से 'संत' शब्द निकाल दिया जाना चाहिए। यह इतना पवित्र शब्द है कि इसे यूं ही किसी के साथ जोड़ देना उचित नहीं है। मेरे जैसे आदमी के साथ तो और भी नहीं, जो बस एक साधारण-सा सत्यशोधक होने का दावा करता है, जिसे अपनी सीमाओं और अपनी त्रुटियों का अहसास है और जब-जब उससे गुटिया! हो जाती है, तब-तब बिना हिचक उन्हें स्वीकार कर लेता है और जो निस्संकोच इस बात को मानता है कि वह किसी वैज्ञानिक की भांति, जीवन की कुछ 'शाश्वत सच्चाइयों' के बारे में प्रयोग कर रहा है, किंतु वैज्ञानिक होने का दावा भी वह नहीं कर सकता, क्योंकि अपनी पद्धतियों की वैज्ञानिक यथार्थता का उसके पास कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है और न ही वह अपने प्रयोगों के ऐसे प्रत्यक्ष परिणाम दिखा सकता है जैसे कि आधुनिक विज्ञान को चाहिए।




मुझे संत कहना यदि संभव भी हो तो अभी उसका समय बहुत दूर है। मैं किसी भी रूप या आकार में अपने आपको संत अनुभव नहीं करता। लेकिन अनजाने में हुई भूलचूकों के बावजूद मैं अपने आपको सत्य का पक्षधर अवश्य अनुभव करता हूं।


मैंने कभी अपने आपको संन्यासी नहीं कहा। संन्यास बड़ी कठिन चीज है। मैं तो स्वयं को एक गृहस्थ मानता हूं जो अपने सहकर्मियों के साथ मिलकर, मित्रों की दानशीलता पर जीवन निर्वाह करते हुए, सेवा का विनम्र जीवन जी रहा है... मैं जो जीवन जी रहा हूं वह पूर्णतया सुगम और बड़ा सुखकर है, यदि सुगमता और सुख को मनःस्थिति मान लें तो। मुझे जो कुछ चाहिए, वह सब उपलब्ध है और मुझे व्यक्तिगत पूंजी के रूप में कुछ भी संजोकर रखने की कतई जरूरत नहीं है।


बिना आस्था के काम करना ऐसा ही है जैसा कि बिना पेंदे के गर्त का पेंदा ढूंढना।


मुझे मेरे संपूर्ण दोषों के साथ ही स्वीकार किया जाना चाहिए। मैं एक सत्यशोधक हूं। मेरे लिए मेरे प्रयोग सर्वोलम तैयारी वाले हिमालय अभियानों से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं ।


जब भी मैं किसी दोषी व्यक्ति को देखता हूं तो मैं अपने आप से कहता हूं की मैंने भी गलतियां की हैं; जब मैं किसी कामुक व्यक्ति को देखता हूं तो अपने आप से कहता हूं की मैं भी कभी ऐसा ही था; और इस प्रकार दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के साथ मैं अपनी नातेदारी, अपनी बंधुता अनुभव करता हूं और यह अनुभव करता हूं कि जब तक हम में से सर्वाधिक दीन व्यक्ति सुखी नहीं होगा, मैं भी सुखी नहीं हो सकता।


विरोधियों का सम्मान


मुझे सदा यह देखकर संतोष का अनुभव हुआ है कि मैं जिनके सिद्धांतों और नीतियों का विरोध करता हूं, वे भी प्रायः मेरे प्रति अपना प्रेम और विश्वास यथावत बनाए रखते हैं। दक्षिण अफ्रीकियों ने भी व्यक्तिगत स्तर पर मुझे अपना विश्वास और मित्रता दी।


ब्रिटिश नीति और प्रणाली की भर्त्सना करने के बावजूद मुझे हजारों अंग्रेज स्त्री-पुरुषों का स्नेह प्राप्त है और आधुनिक भौतिकवादी सभ्यता की पूरी तरह निंदा करने पर भी मेरे यूरोपीय और अमरीकी मित्रों की संख्या बढ़ती ही जाती है यह भी अहिंसा की ही विजय है।


गांधीजी का प्रिय भजन


वैष्णव जन तो तेने कहिये,
जे पीड पराई जाणे रे।।


पर दृखे उपकार करे तोये,
मन अभिमान न आणे रे।।


सकल लोकमां सहुने वंदे,
निंदा न करे केनी रे।।


वाच काछ मन निश्चल राखे,
धन-धन जननी तेनी रे।।


समदृष्टी ने तृष्णा त्यागी,
परत्री जेने ताम रे।।


जिहृवा थकी असत्य न बोले,
पर धन नव झाले हाथ रे।।


मोह माया व्यापे नहि जेने,
दृढ वैराग्य जेना मनमां रे।।


रामनाम शुं ताली लागी,
सकल तीरथ तेना तनमां रे।।


वणलोभी ने कपटरहित छे,
काम क्रोध निवार्या रे।।


भणे नरसैयों तेनु दरसन करतां,
कुळ एकोतेर तार्या रे।।